श्रीरामकृष्णस्तोत्राणि

श्रीरामकृष्णाष्टकम्

श्रीमद्रामकृष्णपादाब्जसुधापानोन्मत्ता रसिका
भावुकाः पिबन्तु सर्वकल्याणकरं तन्नामामृतं मुदा ।

विश्वस्य धाता पुरुषस्त्वमाद्यः
        अव्यक्तरूपेण ततं त्वयेदम् ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥१॥

त्वं पासि विश्वं सृजसि त्वमेव,
        त्वमादिदेवो विनिहंसि सर्वम् ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥२॥

मायां समाश्रित्य करोषि लीलां
        भक्तान्समुद्धर्तुमनन्तमूर्तिः ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥३॥

विधृत्य रूपं नरवत्त्वया वै,
        विज्ञापितो धर्म इहातिगुह्यः ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥४॥

तपोऽथ ते त्यागमदृष्टपूर्वं
        दृष्ट्वा नमस्यन्ति कथं न विज्ञाः ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥५॥

श्रुत्वात्र ते नाम भवन्ति भक्ता
        दृष्ट्वा वयं तन्न तु भक्तियुक्ताः ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥६॥

सत्यं विभुं शान्तमनादिरूपं
        प्रसादये त्वजमनन्तशून्यम् ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥७॥

जानामि तत्त्वं न हि दैशिकेन्द्रं,
        किं वा स्वरूपं कथमेव भावम् ।
हे रामकृष्ण त्वयि भक्तिहीने,
        कृपाकटाक्षं कुरु देव नित्यम् ॥८॥

इति श्रीमदभेदानन्दस्वामिना विरचितं श्रीमद्रामकृष्णाष्टकं समाप्तम् ।

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