श्रीसारदादेवीस्तोत्रम्

श्रीश्रीसारदाषट्कम्

धवलवसनवेषा मूर्तकारुण्यदेहा
        सुरनरमुनिवन्द्या रामकृष्णार्चिताद्या ।
सकलगुणयुता नो वेष्टिताङ्गा सलज्जा
        जननमरणभङ्गा सारदा पातु दिव्या ॥१॥

विमलगगनशुद्धा सर्वलोकार्थचिन्ता
        विगतविषमदृष्टिश्चिन्मयी शान्तिदात्री ।
त्रिभुवनजनधात्री मङ्गला मर्त्यभूमौ
        अवतरति परेशे स्वेच्छयाविर्भवन्ती ॥२॥

त्रिपुरदहनकान्ता रामचन्द्रस्य कन्या
        निखिलभुवनकर्त्री मार्जनीहस्तमृष्टिः ।
भवनिगडविमुक्तिर्याद्य माया विमुग्धा,
        नरपतिगणशास्त्री दैन्यदुःखे धरित्री ॥३॥

प्रलयसमयघोरा रोष सङ्घातदेहा
        स्तनितभयविधात्री कालिका विश्वहर्त्री ।
अमरनिकरवन्द्या देवदेवोरुवासा
        नटनहसनलास्या सारदा भिन्नरूपा ॥४॥

दशभुजदशशस्त्रा दिव्यमोदा सुहास्या
        गुहगणपतिमाता दक्षकन्या शरण्या ।
विनतभयविहन्त्री पार्वती राज्यलक्ष्मीः
        विधिहरिभवपात्रं सारदा भूतधात्री ॥५॥

जपनभजनहीना किंनु पुत्राः कुपुत्रा
        व्यसनगणनियुक्ताः किंनु हेया जनन्या ।
इति गुणततिशून्यान् सारदे त्रायतां नो
        विदितसकलदोषा नैव माता जहाति ॥६॥

सर्वदेवात्मिकां वन्दे सर्वदेवमयीं भजे,
        सारदां प्रार्थये भक्तिं तत्पादाम्बुरुहद्वये ॥७॥

ब्रह्मचारिमेधाचैतन्येन विरचितं श्रीसारदाषट्कं समाप्तम् ।

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